Wednesday, 10 August 2016

पायलट जो बादलों को बरसने पर करते हैं मजबूर

पायलट जो बादलों को बरसने पर करते हैं मजबूर

आपने कई बार सुना होगा कि फ़लां देश में, फ़लां जगह पर 'क्लाउड सीडिंग' से बारिश कराई गई.
यानी बादलों पर ज़ोर डालकर उनसे पानी बरसाया गया.
आख़िर क्या होती है ये 'क्लाउड सीडिंग'? कौन करता है ये काम? कैसे कराई जाती है बादलों से ज़बरदस्ती बारिश?
बादलों से बारिश कराने का ये काम करते हैं कुछ ख़ास पायलट.
ये पायलट हवाई जहाज़ को बादलों के घेरे के अंदर ले जाते हैं और फिर 'क्लाउड सीडिंग' करके बारिश कराते हैं.
दुनिया में पायलटों की जितनी तरह की ट्रेनिंग होती है, उनमें से एक में भी 'क्लाउड सीडिंग' का हुनर नहीं सिखाया जाता.
इसके लिए पायलटों को अलग से रियाज़ कराया जाता है.
जब कोई पायलट बादलों के तूफ़ान के अंदर घुसता है, तो ये उड़ान किसी एक जगह से दूसरी जगह जाने की नहीं होती.
असल में ये उड़ान होती है मौसम का रुख़ अपने मुताबिक़ करने की.
बादलों के बीच घुसने पर पहले पहल तो पायलटों को कुछ दिखाई ही नहीं देता.
काले-सफ़ेद घने बादलों से हवाई जहाज़ घिर जाता है.
इस अंधेरे के बीच उन्हें बारिश वाले बादल तलाशकर 'क्लाउड सीडिंग' करनी होती है.
'क्लाउड सीडिंग' को आसान लफ़्ज़ों में 'बादलों को भारी कर बरसात कराना' कह सकते हैं.
इस दौरान बादलों पर कुछ ख़ास केमिकल का छिड़काव किया जाता है.
इससे उनके अंदर की पानी की बूंदें भारी होकर बारिश के तौर पर ज़मीन पर गिरती हैं.
पिछले कुछ सालों में दुनिया में 'क्लाउड सीडिंग' में काफ़ी दिलचस्पी ली जा रही है.
ख़ास तौर से वो देश, जो बारिश की कमी या पानी की क़िल्लत झेल रहे हैं.
वहां बनावटी तरीक़े से बारिश कराने का तजुर्बा किया जा रहा है.
आज दुनिया भर में क़रीब साठ देश इसका प्रयोग कर रहे हैं. ताकि ख़ाली झीलें और जलाशय भर सकें.
सूखे इलाक़ों को राहत देने वाली बारिश भी 'क्लाउड सीडिंग' के ज़रिए कराई जा रही है.
आम तौर पर पायलट, तूफ़ानी बादलों के क़रीब नहीं जाते.
इसीलिए उन्हें 'क्लाउड सीडिंग' के लिए ख़ास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है.
ताकि वो सही बादल पहचानकर 'क्लाउड सीडिंग' के ज़रिए बारिश करा सकें.
अमरीकी कंपनी, वेदर मॉडिफ़िकेशन इनकॉर्पोरेशन या WMI कई देशों में 'क्लाउड सीडिंग' के प्रोजेक्ट चला रही है.
इसके वाइस प्रेसीडेंट हंस ऐलनेस कहते हैं कि 'क्लाउड सीडिंग' को आप ऐसे समझिए कि कोई सीनियर पायलट, भयंकर तूफ़ान के बीच किसी नए पायलट को हवाई जहाज़ की कमान देकर कहे कि, 'बेटा चलो अब विमान तुम उड़ाओ.'
हंस ऐलनेस की कंपनी WMI 1961 में बनायी गई थी.
उस साल अमरीका के नॉर्थ डकोटा राज्य में सूखे की वजह से फ़सलों की भारी तबाही हुई थी.
आज WMI, अफ्रीका, लैटिन अमरीका और एशिया के कई देशों में 'क्लाउड सीडिंग' के प्रोजेक्ट चला रही है.
बादलों से बनावटी तरीक़े से बारिश कराने पर रिसर्च पिछली सदी के चालीस के दशक में ही शुरू हो चुका था.
अमरीका में इस रिसर्च पर काफ़ी ज़ोर दिया जा रहा था.
साठ और सत्तर के दशक में अमरीका में बड़े पैमाने पर 'क्लाउड सीडिंग' के ज़रिए बारिश कराने का चलन शुरु हो गया था.
हालांकि उसके बाद लोगों की इसमें दिलचस्पी अचानक ख़त्म हो गई.
वजह ये थी कि 'क्लाउड सीडिंग' करने वाली कंपनियां लंबे चौड़े दावे करने लगी थीं. और बाद में वो दावे झूठे निकले.
हालांकि अमरीका को छोड़ दें तो दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और इसरायल में 'क्लाउड सीडिंग' की तकनीक को बेहतर बनाने का काम चलता रहा.
पिछले क़रीब एक दशक से तमाम देशों ने एक बार फिर से 'क्लाउड सीडिंग' या बनावटी बारिश में दिलचस्पी दिखानी शुरू की है.
विश्व मौसम संगठन, WMO के डियॉन टर्ब्लांश कहते हैं कि आज चीन और भारत जैसे बड़े देश बनावटी बारिश को लेकर कई तजुर्बे कर रहे हैं.
नब्बे के दशक में दक्षिण अफ्रीका में हाइग्रोस्कोपिक 'क्लाउड सीडिंग' को इजाद किया गया.
जिसमें बादलों में सोडियम, मैग्नीसियम और पोटैशियम जैसे केमिकल का छिड़काव करके बारिश कराई जाती है.
ये नमक बादल के भीतर की पानी की बूंदों से चिपकर उन्हें भारी कर देते हैं.

फिर बरखा की बूंदें बारिश के तौर पर ज़मीन पर गिरने लगती हैं.
कई बार तोपों और रॉकेट की मदद से भी तूफ़ानी बादलों पर केमिकल फेंके जाते हैं, ताकि बारिश हो सके.
हालांकि बनावटी बारिश कराने के लिए ये तरीक़ा सस्ता पड़ता है.
मगर, कई बार बारिश कराने के लिए आसमान में हवाई जहाज़ों को बादलों के बीच भेजना ही पड़ता है.
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत होते-होते 'क्लाउड सीडिंग' में तमाम देशों की दिलचस्पी काफ़ी बढ़ गई थी.
उस वक़्त क़रीब 40 देश बनावटी बारिश के लिए पैसे ख़र्च कर रहे थे.
'क्लाउड सीडिंग' में इस्तेमाल होने वाले विमान आम तौर पर दो इंजन वाले होते हैं, जिनके पंखों और नीचे की तरफ़ केमिकल के रैक लगाए जाते हैं.
इनके ज़रिए बादलों पर केमिकल छिड़के जाते हैं.
किसी तूफ़ान के अंदर के बादलों और बारिश के चक्र को समझना बेहद ज़रूरी है.
तभी 'क्लाउड सीडिंग' की कोशिशें कामयाब हो सकती हैं.
वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गेनाइज़ेशन के ज्यां फ्रांस्वा बार्थोम्यू ने इसके लिए सीरिया, ऑस्ट्रिया और भारत में पायलटों को ट्रेनिंग दी है.
'क्लाउड सीडिंग' के लिए पहले रडार के ज़रिए आसमान में उठे तूफ़ानी बादलों की पड़ताल की जाती है.
इसके बाद पायलट को विमान लेकर केमिकल छिड़कने के लिए बादलों के उस घेरे के भीतर भेजा जाता है.
अगर पायलट को ये लगता है कि बादलों की बूंदों में पानी की तादाद अच्छी है, तो वो केमिकल के ज़रिए उन्हें बारिश के तौर पर ज़मीन पर गिराने की कोशिश करता है.
यही 'क्लाउड सीडिंग' होती है.
आम तौर पर गर्मियों के तूफ़ान के बादलों से बारिश कराना आसान होता है.
क्योंकि केमिकल छिड़कने के बाद पानी की बूंदें गिरती हैं.
वहीं ठंड के दिनों में बादलों पर केमिकल छिड़कने से उसकी बूंदें बर्फ़ में तब्दील होकर हवाई जहाज़ को ही घेर लेती हैं.
जब क़रीब छह किलोमीटर की ऊंचाई पर विमान के ज़रिए बारिश कराने की कोशिश होती है, तो पायलट को तूफ़ान के घेरे के क़रीब जाना होता है.
कई बार उसे बादलों के बीच घुसना पड़ता है. वहां पर जहाज़ उड़ाना आसान नहीं होता.
पायलटों को विमान को उलट-पुलटकर चारों तरफ़ केमिकल का छिड़काव करना होता है.
ताकि ज़्यादा से ज़्यादा बारिश कराई जा सके.
आम तौर पर 'क्लाउड सीडिंग' से बनावटी बारिश के मिशन कामयाब होते हैं.
लेकिन हर जगह के लिए कामयाबी का एक सा नुस्खा नहीं होता.
असल में अलग-अलग इलाक़ों के बादलों की बनावट अलग होती है.
उनके हिसाब से ही 'क्लाउड सीडिंग' का काम होता है.


इसके लिए ज़रूरी है कि इलाक़े के मौसम को ढंग से समझ लिया जाए.
जैसे कि अमरीका के नॉर्थ डकोटा के बादल, थाईलैंड या लीबिया के आसमान पर उड़ने वाले बादलों से अलग होंगे.
लीबिया या क़तर में ठंड के दिनों में ही 'क्लाउड सीडिंग' से बारिश कराई जा सकती है.
गर्मी में बादलों के भीतर पानी की बूंदें बहुत कम होती हैं.
ऐसे में 'क्लाउड सीडिंग' से बनावटी बारिश की कोशिश का नाक़ाम होना तय है.
'क्लाउड सीडिंग' में तमाम देशों की दिलचस्पी को देखते हुए, आज WMO तमाम देशों को इस बारे में जानकारी मुहैया करा रहा है.
डियॉन टर्ब्लांश कहते हैं कि देशों को अति उत्साह में नहीं आना चाहिए.
बनावटी तरीक़े से बारिश कराने की अपनी पाबंदियां हैं. इससे कहीं भी, कभी भी बारिश नहीं कराई जा सकती.
बेहतर होगा कि तमाम देश इस बारे में अच्छे जानकार तलाशकर पहले सलाह-मशविरा कर लें. फिर किसी मिशन के बारे में सोचें.
धरती के बदलते तापमान की वजह से कई देश सूखे और पानी की क़िल्लत झेल रहे हैं.
ऐसे में 'क्लाउड सीडिंग' से बारिश कराने की मांग बढ़ती जा रही है.
लेकिन बनावटी बारिश तभी हो सकती है जब वहां के तूफान के अंदर के बादलों में पानी की बूंदें हों.
'क्लाउड सीडिंग' से पानी नहीं बनाया जा सकता.
ऐसा भी नहीं हो सकता कि कहीं और के बादलों को कहीं और घसीटकर ले जाया जाए और वहां बारिश करा दी जाए.
'क्लाउड सीडिंग' का मतलब किसी इलाक़े में उठे तूफ़ानी बादलों से बारिश कराना है.
जानकार सलाह देते हैं कि इस काम में लगे लोगों को भी लंबे-चौड़े दावे करने से बचना चाहिए.
तकनीक की तरक़्क़ी से हम यहां तक पहुंचे हैं कि बनावटी बारिश करा सकें.
लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम क़ुदरत को चुनौती देने की हालत में पहुंच गए हैं.
वैसे 'क्लाउड सीडिंग' से बारिश को लेकर बहुत से लोग आशंकाएं भी जताते हैं.
जैसे ये कि बनावटी बारिश का मतलब एक जगह का पानी दूसरे जगह बरसाना है.
या फिर कहीं 'क्लाउड सीडिंग' से बारिश कराने से किसी और जगह सूखा पड़ जाएगा. जानकार इन बातों को ग़लत ठहराते हैं.
हालांकि बनावटी बारिश कराने के रूस और चीन जैसे देशों के तरीक़ों पर भी सवाल उठ रहे हैं.
यहां पर ओलों की बारिश होने से भी रोका जाता है. डियॉन टर्ब्लांश कहते हैं कि ये तक़नीकी रूप से मुमकिन नहीं.
इसी तरह WMO के ज्यां फ्रांस्वां बार्थोम्यू ने भी कई जगह देखा है कि पायलट और वैज्ञानिक, बनावटी बारिश कराने के लंबे चौड़े दावे करते हैं.
बॉर्थोम्यू कहते हैं कि धरती पर बढ़ती गर्मी से निपटने में 'क्लाउड सीडिंग' काफ़ी काम आ सकती है.
लेकिन इसको लेकर अभी और रिसर्च किए जाने की ज़रूरत है. तमाम देशों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.
हाल के दिनों में चीन ने इस पर काफ़ी पैसा लगाया है.
इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी 'क्लाउड सीडिंग' पर करोड़ों रुपए ख़र्च कर रहे हैं.
इन कोशिशों से बनावटी बारिश कराने की नई तक़नीक भी इजाद हुई है.
जैसे कि ड्रोन के ज़रिए बनावटी बारिश कराने के तजुर्बे कामयाब रहे हैं.
हालांकि बारिश की जितनी मांग है, उस ज़रूरत को 'क्लाउड सीडिंग' से पूरा किया जा सकेगा, ये कहना मुश्किल है.
बादल बेहद पेचीदा और राज़दाराना चीज़ हैं. इन्हें समझने में अभी और वक़्त लगेगा. ये बड़ी चुनौती है.
पर फिलहाल हम उनसे ज़रूरत के मुताबिक़ कुछ बारिश तो करा ही सकते हैं.
दुनिया में बढ़ते जल संकट को देखते हुए ये राहत की बात ही कही जाएगी.






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